मानस नेशनल पार्क में 16 तरह की घास की नर्सरी, हाथी-गैंडे के भोजन से लेकर महिला फॉरेस्ट स्टेशन तक खास व्यवस्था
असम के मानस नेशनल पार्क में 16 स्थानीय प्रजातियों की घास की नर्सरी विकसित की गई है। यूपी के पत्रकारों ने ग्रास नर्सरी, वन्यजीव संरक्षण और महिला संचालित फॉरेस्ट स्टेशन को करीब से देखा।


16 प्रजातियों की घास से तैयार हो रही वन्यजीवों के भोजन की व्यवस्था
ग्रास नर्सरी में मानस के अलग-अलग प्राकृतिक आवासों से जुटाई गई 16 स्थानीय घास प्रजातियों को विकसित किया जा रहा है। जून 2026 की रिपोर्टों के अनुसार इन घास प्रजातियों को नवंबर 2025 से मानस के विभिन्न हिस्सों से एकत्र कर विशेष नर्सरी बेड में तैयार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य मानस के घास वाले आवासों को मजबूत करना और शाकाहारी वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक चारे की उपलब्धता बढ़ाना है।
मानस में इस व्यवस्था को समझने के दौरान असिस्टेंट डायरेक्टर युवराज ने बताया कि अलग-अलग प्रकार की घास को उनकी जरूरत के अनुसार पार्क के विभिन्न हिस्सों में लगाया जाता है। खास तौर पर हाथी और गैंडे जैसे बड़े शाकाहारी जानवरों के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने की दिशा में यह व्यवस्था महत्वपूर्ण है। यानी वन्यजीवों को सिर्फ जंगल में सुरक्षित रखना ही लक्ष्य नहीं है, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास में उनकी भोजन संबंधी जरूरतों को भी ध्यान में रखा जा रहा है।

यह पहल मानस के घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। मानस हिमालय की तलहटी में स्थित एक समृद्ध जैव विविधता वाला क्षेत्र है और यहां घासभूमियां कई शाकाहारी वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास उपलब्ध कराती हैं। UNESCO के अनुसार मानस विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण जैव विविधता वाला क्षेत्र है, जहां हाथी, बाघ और एक सींग वाले गैंडे समेत कई महत्वपूर्ण प्रजातियां पाई जाती हैं।
जंगल के भीतर भोजन उपलब्ध कराने का मकसद
मानस में घास प्रबंधन की इस व्यवस्था का एक अहम उद्देश्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को मजबूत करना है। अगर बड़े शाकाहारी जानवरों को जंगल के भीतर पर्याप्त प्राकृतिक भोजन और उपयुक्त आवास मिलता रहे तो उनके भोजन की तलाश में मानव आबादी वाले इलाकों की ओर जाने की जरूरत कम हो सकती है। इससे वन्यजीवों और आसपास रहने वाली मानव आबादी के बीच संभावित संघर्ष को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
इस पूरी प्रक्रिया में ग्रास नर्सरी एक तरह से संरक्षण की शुरुआती कड़ी के तौर पर काम कर रही है। नर्सरी में तैयार की गई स्थानीय घास को जरूरत के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में लगाया जाता है, जिससे वहां मौजूद वन्यजीवों के लिए चारे की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिले।

मानस में महिलाओं के हाथों फॉरेस्ट स्टेशन की जिम्मेदारी
मानस के भ्रमण के दौरान वन्यजीव संरक्षण की व्यवस्था का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भी देखने को मिला। पार्क के भीतर एक ऐसा फॉरेस्ट स्टेशन है, जिसका संचालन महिलाओं की टीम करती है। वन क्षेत्र में निगरानी और स्टेशन से जुड़ी जिम्मेदारियों को संभालती महिला कर्मियों से बातचीत के दौरान यह जानने का मौका मिला कि जंगल में काम करने की शुरुआत उनके लिए आसान नहीं थी।

महिला रेंजर कौर ने बातचीत में बताया कि शुरुआत में जंगल और इस तरह की जिम्मेदारी को लेकर डर लगता था, लेकिन उन्होंने सोचा कि जब दूसरे लोग यह काम कर सकते हैं तो महिलाएं क्यों नहीं। इसके बाद उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को चुनौती के रूप में लिया और आज अपने स्टेशन को अपने दम पर संचालित कर रही हैं। मानस के इस स्टेशन ने यह दिखाया कि वन्यजीव संरक्षण और वन प्रबंधन के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी किस तरह बढ़ रही है।
2 अक्टूबर से पर्यटकों के लिए खुल सकता है मानस
मानस नेशनल पार्क के अधिकारियों ने मीडिया प्रतिनिधिमंडल को बताया कि 2 अक्टूबर 2026 से पार्क को पर्यटकों के लिए खोला जाएगा। इसके साथ ही नए पर्यटन सत्र में पर्यटकों को मानस के जंगल, घासभूमि और वन्यजीवों को करीब से देखने का अवसर मिलेगा।
मानस केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय महत्व का संरक्षण क्षेत्र भी है। UNESCO की विश्व धरोहर सूची में Manas Wildlife Sanctuary वर्ष 1985 से शामिल है। संरक्षण प्रयासों में सुधार के बाद इसे 2011 में विश्व धरोहर संकट सूची से हटाया गया था।
मानस की यात्रा में दिखी संरक्षण की पूरी तस्वीर
मानस नेशनल पार्क का यह दौरा सिर्फ जंगल और वन्यजीवों को देखने का अनुभव नहीं रहा। ग्रास नर्सरी से शुरू हुई यात्रा ने यह समझने का अवसर दिया कि वन्यजीव संरक्षण में उनके प्राकृतिक भोजन और आवास को बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है। 16 स्थानीय घास प्रजातियों को तैयार करने से लेकर उन्हें पार्क के अलग-अलग हिस्सों में लगाने, हाथी और गैंडे जैसे शाकाहारी जानवरों के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने और जंगल की निगरानी के लिए महिला कर्मियों की भागीदारी तक, मानस में संरक्षण की एक विस्तृत तस्वीर देखने को मिली।
‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के तहत आयोजित यह मीडिया दौरा असम की प्राकृतिक और वन्यजीव विरासत को करीब से समझने का अवसर है। मानस में दिखाई दी घास नर्सरी और महिला संचालित फॉरेस्ट स्टेशन यह बताते हैं कि किसी राष्ट्रीय उद्यान का संरक्षण सिर्फ वन्यजीवों की सुरक्षा तक सीमित नहीं होता, बल्कि आवास, भोजन, निगरानी, स्थानीय पारिस्थितिकी और मानव संसाधन—इन सभी को साथ लेकर चलना पड़ता है।



