UP Infrastructure: ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के लिए विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी जरूरी, मुख्य सचिव ने दिए प्रोजेक्ट्स में तेजी के निर्देश
मुख्य सचिव एसपी गोयल ने लखनऊ में Linear Infrastructure Projects पर स्टेट लेवल वर्कशॉप का शुभारंभ किया। भूमि अधिग्रहण, यूटिलिटी शिफ्टिंग, स्वीकृतियों और विभागीय समन्वय से जुड़े कार्य समयबद्ध करने पर जोर दिया।

UP Infrastructure: ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के लिए विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी जरूरी, मुख्य सचिव एसपी गोयल ने दिए प्रोजेक्ट्स में तेजी के निर्देश
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने और निर्माण कार्यों में आने वाली बाधाओं का तेजी से समाधान करने पर सरकार का फोकस है। इसी उद्देश्य से लखनऊ के अहिमामऊ स्थित राम मनोहर लोहिया उत्तर प्रदेश प्रशासन एवं प्रबंधन अकादमी (रूपाम) में ‘Accelerating Linear Infrastructure Projects: Good Practices and New Ideas’ विषय पर एक दिवसीय स्टेट लेवल वर्कशॉप आयोजित की गई। मुख्य सचिव एस.पी. गोयल ने कार्यशाला का शुभारंभ करते हुए कहा कि वर्ष 2047 की विकास परिकल्पना के अनुरूप प्रदेश में अवसंरचना विकास को गति देने के लिए बेहतर तैयारी, समयबद्ध विभागीय समन्वय और निर्माण में आने वाली बाधाओं का सक्रिय समाधान जरूरी है।
ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के लक्ष्य में कनेक्टिविटी की अहम भूमिका
मुख्य सचिव एस.पी. गोयल ने कहा कि उत्तर प्रदेश को ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य की दिशा में विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी नेटवर्क का विस्तार महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक सड़क, रेलवे, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, लॉजिस्टिक्स हब, एयरपोर्ट और शहरी अवसंरचना प्रदेश के आर्थिक विकास की आधारशिला हैं। इसलिए केवल नई परियोजनाओं को स्वीकृति देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें निर्धारित समयसीमा में धरातल पर उतारना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि किसी भी लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना में निर्माण शुरू होने से पहले ही भूमि की उपलब्धता, डिजाइन, यूटिलिटी शिफ्टिंग और जरूरी वैधानिक स्वीकृतियों से जुड़ी तैयारियां पूरी कर ली जानी चाहिए। इससे निर्माण शुरू होने के बाद आने वाली ऐसी अड़चनों को कम किया जा सकेगा, जिनके कारण परियोजनाओं की गति प्रभावित होती है।
केवल प्रगति प्रतिशत नहीं, हर बाधा की मॉनिटरिंग पर जोर
मुख्य सचिव ने कहा कि परियोजना नेतृत्व का ध्यान केवल कुल भौतिक प्रगति या परियोजना के कितने प्रतिशत पूरा होने पर नहीं होना चाहिए। इसके बजाय यह देखा जाना चाहिए कि निर्माण कार्य की गति को प्रभावित करने वाली बाधाएं कहां और क्यों मौजूद हैं और उनका समाधान कितने समय में किया जा सकता है।
उन्होंने बड़े कॉरिडोर और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को छोटे, व्यवस्थित और प्रबंधनीय निर्माण खंडों में विभाजित करने पर जोर दिया। इससे परियोजना के प्रत्येक हिस्से की अलग-अलग निगरानी की जा सकेगी और किसी विशेष स्थान पर काम की स्थिति का तत्काल आकलन संभव होगा।
उन्होंने कहा कि मॉनिटरिंग केवल परियोजना के समग्र स्तर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे निर्माण गतिविधियों के स्तर तक ले जाना जरूरी है। इससे यह पता चल सकेगा कि किसी विशेष स्थान पर भूमि, यूटिलिटी, पुल, कल्वर्ट, अतिक्रमण या पर्यावरणीय स्वीकृति से संबंधित कौन-सी बाधा मौजूद है।
भूमि अधिग्रहण और यूटिलिटी शिफ्टिंग में तेजी के निर्देश
मुख्य सचिव ने संबंधित विभागों और अधिकारियों को विकास परियोजनाओं में आने वाली बाधाओं का निर्धारित समयसीमा में निस्तारण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने विशेष रूप से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने पर जोर दिया।
उन्होंने भूमि अधिग्रहण, यूटिलिटी शिफ्टिंग और ट्री कटिंग से संबंधित कार्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि संबंधित विभाग नियमित रूप से इनकी प्रगति की निगरानी करें। लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण किया जाए और विभाग आपसी समन्वय के साथ यूटिलिटी शिफ्टिंग तथा वृक्ष कटान से जुड़ी आवश्यक औपचारिकताओं को प्राथमिकता पर पूरा करें।
मुख्य सचिव के अनुसार, निर्माण कार्य शुरू होने के बाद यदि इन प्रक्रियाओं से संबंधित बाधाएं सामने आती हैं तो परियोजना की गति प्रभावित हो सकती है। इसलिए इनसे जुड़े कार्यों को पहले से पूरा करना परियोजना प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
कई एजेंसियों के बीच समन्वय के लिए इंटरफेस मैनेजमेंट सिस्टम पर जोर
लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में कई विभागों और एजेंसियों की भूमिका होती है। इनमें लोक निर्माण विभाग (PWD), भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI), रेलवे, विद्युत विभाग, जल निगम, दूरसंचार, राजस्व, वन विभाग, पुलिस और शहरी स्थानीय निकाय शामिल हैं। मुख्य सचिव ने कहा कि इन एजेंसियों के बीच प्रभावी समन्वय नहीं होने पर परियोजनाओं में देरी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
इसके समाधान के लिए उन्होंने प्रभावी इंटरफेस मैनेजमेंट सिस्टम विकसित करने की जरूरत बताई। इसमें प्रत्येक समस्या के लिए संबंधित एजेंसी, जिम्मेदार अधिकारी, समस्या का स्थान, निर्धारित समयसीमा और मौजूदा स्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज होनी चाहिए। ऐसी व्यवस्था से किसी भी परियोजना में लंबित समस्या की जिम्मेदारी और उसकी प्रगति को अधिक स्पष्ट तरीके से ट्रैक किया जा सकेगा।
निर्माण से पहले की तैयारी को बताया महत्वपूर्ण आधार
मुख्य सचिव ने लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए चार प्रमुख आधारों पर जोर दिया। इनमें निर्माण मोर्चे की तैयारी, विभागीय समन्वय एवं स्वीकृतियां, हितधारक एवं इंटरफेस प्रबंधन तथा तकनीक एवं पारदर्शिता शामिल हैं। इसके अलावा जोखिम प्रबंधन, गुणवत्ता, सुरक्षा और अनुबंध प्रबंधन को परियोजनाओं के सहायक स्तंभ के रूप में मजबूत करने की आवश्यकता बताई गई।
उन्होंने कहा कि परियोजनाओं में आने वाली समस्याओं के सामने आने का इंतजार करने के बजाय संभावित बाधाओं की पहले से पहचान की जानी चाहिए। यदि संभावित जोखिमों और अड़चनों का आकलन निर्माण शुरू होने से पहले किया जाए तो उनके समाधान की तैयारी भी समय रहते की जा सकती है।
एक्सप्रेसवे, हाईवे और रेलवे नेटवर्क को औद्योगिक विकास से जोड़ने पर जोर
मुख्य सचिव ने कहा कि उत्तर प्रदेश के एक्सप्रेसवे, हाईवे और रेलवे नेटवर्क औद्योगिक विकास, लॉजिस्टिक्स, शहरीकरण और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश का उद्देश्य केवल सड़क या रेल नेटवर्क की लंबाई बढ़ाना नहीं होना चाहिए, बल्कि औद्योगिक क्लस्टरों, शहरों, बाजारों, लॉजिस्टिक्स हब, एयरपोर्ट और रेलवे नेटवर्क के बीच निर्बाध कनेक्टिविटी विकसित करना होना चाहिए।
उनके अनुसार, ऐसी कनेक्टिविटी से आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ निवेश, रोजगार और क्षेत्रीय विकास के लिए भी आधार मजबूत हो सकता है। इस दृष्टि से बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को अलग-अलग परियोजनाओं के बजाय एक व्यापक कनेक्टिविटी नेटवर्क के हिस्से के रूप में देखने पर जोर दिया गया।
2047 की विकास परिकल्पना के अनुरूप इंफ्रास्ट्रक्चर विकास
मुख्य सचिव ने कार्यशाला में प्रतिभागियों का आह्वान किया कि तेज योजना, बेहतर पूर्व-तैयारी, समयबद्ध समन्वय और बाधाओं के सक्रिय समाधान के जरिए इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की गति बढ़ाई जाए। साथ ही उन्होंने गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि कार्यशाला के माध्यम से उद्योग जगत और विभिन्न संस्थाओं की बेहतर कार्यप्रणालियों, अनुभवों और नए विचारों का आदान-प्रदान होगा। इससे उत्तर प्रदेश में अधिक दक्ष, तकनीक आधारित, पारदर्शी और परिणामोन्मुखी इंफ्रास्ट्रक्चर विकास व्यवस्था तैयार करने में मदद मिल सकती है और प्रदेश की दीर्घकालिक विकास यात्रा को गति मिल सकती है।
कार्यक्रम में प्रमुख सचिव लोक निर्माण अजय चौहान, रूपाम के निदेशक संजय कुमार, सचिव दिव्य प्रकाश गिरी सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।



