लखनऊ में आज से ओशो गीता ध्यान यज्ञ, देश-विदेश से 250 साधक हुए शामिल
लखनऊ के आनंदी मैजिक वर्ल्ड रिसॉर्ट में 1 से 4 अक्टूबर तक ओशो गीता ध्यान यज्ञ होगा। देश-विदेश से करीब 250 साधक-साधिकाएं शिविर में शामिल होंगे।

लखनऊ। राजधानी लखनऊ में गुरुवार से चार दिवसीय ओशो गीता ध्यान यज्ञ की शुरुआत होगी। दिव्य प्रेम ध्यान साधना फाउंडेशन की ओर से आयोजित यह ध्यान शिविर कानपुर रोड स्थित आनंदी मैजिक वर्ल्ड रिसॉर्ट में आयोजित किया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार, शिविर में भाग लेने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों से भी करीब 250 साधक-साधिकाएं लखनऊ पहुंचे हैं। चार दिनों तक चलने वाले इस शिविर में ओशो के भगवद्गीता पर दिए गए प्रवचनों और ध्यान साधना के माध्यम से गीता के विभिन्न पहलुओं को समझने और उन्हें जीवन से जोड़ने पर चर्चा होगी।
आयोजकों के मुताबिक, शिविर में ओशो के उन चुनिंदा अमृत वचनों और प्रवचनों पर केंद्रित साधना एवं चर्चा होगी, जिनमें उन्होंने भगवद्गीता के 18 अध्यायों की विस्तृत व्याख्या की थी। ये प्रवचन वर्ष 1970 से 1975 के बीच दिए गए थे। ध्यान यज्ञ के दौरान साधकों को गीता के दर्शन, ध्यान और आत्म-अनुभूति से जुड़े विषयों पर अलग-अलग सत्रों के माध्यम से जानकारी दी जाएगी।
देश-विदेश से पहुंचे करीब 250 साधक-साधिकाएं
ध्यान यज्ञ की मुख्य आयोजिका दिव्य ज्योति ने बताया कि शिविर में देश के विभिन्न राज्यों के साथ विदेशों से भी साधक-साधिकाएं शामिल हो रही हैं। कार्यक्रम का संचालन देश-विदेश में ओशो की ध्यान पद्धति से जुड़े प्रख्यात ओशो संन्यासियों द्वारा किया जा रहा है।
आयोजकों के अनुसार, शिविर में हरियाणा से ओशो अनुज स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती, गुरु मां अमृता प्रिया, मां मंजुषा, नेपाल से मां अनामिका, दिल्ली से स्वामी चैतन्य सागर और महाराष्ट्र से स्वामी दिगंबर सहित अन्य साधक एवं संन्यासी शामिल हैं। साधकों से ध्यान एवं साधना के दौरान सहजता के लिए सफेद या मैरून रंग के ढीले वस्त्र पहनकर आने का अनुरोध किया गया है।
‘गीता केवल बौद्धिक अध्ययन नहीं, जीवन में उतारने का मार्ग’
शिविर के दौरान अपने प्रवचन में मां अमृता प्रिया ने कहा कि गीता केवल बौद्धिक अध्ययन का विषय नहीं है, बल्कि उसके संदेश को जीवन में उतारने का मार्ग है। उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों से लोग गीता का अध्ययन और चिंतन करते आए हैं, लेकिन इसके बताए मार्ग पर चलने की आवश्यकता है।
उनके अनुसार, गीता के संदेश को केवल पढ़ने या समझने तक सीमित रखने के बजाय उसे जीवन के व्यवहार और अनुभव से जोड़ना जरूरी है। ध्यान यज्ञ में इसी दृष्टिकोण के साथ गीता के विभिन्न अध्यायों और उनके संदेशों पर साधना एवं चिंतन किया जाएगा।
‘शरीर क्षेत्र और आत्मा क्षेत्रज्ञ’
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने भगवद्गीता के 13वें अध्याय का संदर्भ देते हुए शरीर और आत्मा के संबंध को समझाया। उन्होंने कहा कि गीता मनुष्य को आत्मा और शरीर के बीच के भेद को समझने की दिशा देती है। 13वें अध्याय के सार की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि शरीर को क्षेत्र और उसे जानने वाली आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहा गया है।
ध्यान यज्ञ में गीता के इसी तरह के दार्शनिक विषयों को ध्यान और साधना की प्रक्रिया से जोड़कर समझने का प्रयास किया जा रहा है। आयोजकों का कहना है कि शिविर का उद्देश्य प्रतिभागियों को गीता के संदेश को केवल जानकारी के स्तर पर नहीं, बल्कि ध्यान और आत्म-अनुभव के माध्यम से समझने का अवसर देना है।
‘हंसते, नाचते और गाते हुए परमात्मा को जाना जा सकता है’
नेपाल से आईं मां अनामिका ने अपने संबोधन में ओशो की ध्यान पद्धति का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ओशो ने ध्यान में डूबने की एक अलग और सहज कला सिखाई है। उनके अनुसार, ध्यान को केवल गंभीरता, त्याग या तपस्या से जोड़कर देखने के बजाय सहज भाव से भी साधना की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि हंसते, नाचते और गाते हुए भी परमात्मा को जाना जा सकता है। मां अनामिका ने परमात्मा को किसी एक व्यक्ति के रूप में देखने के बजाय समस्त अस्तित्व में गूंजते हुए अनाहत नाद के रूप में वर्णित किया। उन्होंने गीता में ओंकार के उल्लेख का संदर्भ देते हुए कहा कि ध्यान यज्ञ में साधक इसी ओंकार के अनुभव और उसकी साधना पर केंद्रित होंगे।
अन्य वक्ताओं ने भी रखे अपने विचार
ध्यान शिविर में दिल्ली से आए स्वामी चैतन्य सागर तथा मध्य प्रदेश से आईं मां मंजुषा और स्वामी दिगंबर ने भी अपने विचार रखे। चार दिवसीय शिविर के दौरान ध्यान, भगवद्गीता के विभिन्न अध्यायों, ओशो के प्रवचनों और साधना से जुड़े विषयों पर अलग-अलग सत्र आयोजित किए जाएंगे।
आयोजकों के अनुसार, देश-विदेश से आए साधकों की सहभागिता के साथ यह ध्यान यज्ञ चार दिनों तक चलेगा और इसमें गीता के दर्शन को ध्यान एवं साधना के माध्यम से समझने पर विशेष जोर रहेगा।



