अखिलेश यादव पर भूपेंद्र चौधरी और ओम प्रकाश राजभर का पलटवार, एक्सप्रेसवे, पत्रकार और PDA पर साधा निशाना
अखिलेश यादव के लोकतंत्र सेनानी, एक्सप्रेसवे और पत्रकार सुरक्षा संबंधी बयानों पर चौधरी भूपेंद्र सिंह और ओम प्रकाश राजभर ने पलटवार किया। दोनों मंत्रियों ने सपा-कांग्रेस गठबंधन, एक्सप्रेसवे और PDA को लेकर सवाल उठाए।

अखिलेश यादव पर भूपेंद्र सिंह और राजभर का पलटवार, एक्सप्रेसवे से पत्रकार और PDA तक गिनाए पुराने मुद्दे
लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर से लोकतंत्र सेनानियों के सम्मान, पत्रकारों की सुरक्षा और एक्सप्रेसवे निर्माण को लेकर दिए गए बयानों के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री चौधरी भूपेंद्र सिंह और ओम प्रकाश राजभर ने अलग-अलग मुद्दों पर अखिलेश यादव पर निशाना साधा। दोनों नेताओं ने सपा-कांग्रेस की राजनीतिक नजदीकी, अखिलेश सरकार के कार्यकाल में एक्सप्रेसवे निर्माण, पत्रकारों से जुड़े पुराने मामलों और सपा के PDA सामाजिक समीकरण को लेकर सवाल उठाए।
अखिलेश यादव ने 1 अक्टूबर को लोकतंत्र सेनानियों के लिए सपा सरकार बनने पर 51 हजार रुपये प्रतिमाह सम्मान राशि और मुफ्त इलाज का वादा किया था। इस बयान के बाद सत्ता पक्ष के नेताओं ने उनके पुराने राजनीतिक रुख और सपा सरकार के कार्यकाल से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए जवाब दिया।
लोकतंत्र सेनानी और कांग्रेस के साथ राजनीतिक नजदीकी पर भूपेंद्र सिंह का सवाल
चौधरी भूपेंद्र सिंह ने अखिलेश यादव के लोकतंत्र सेनानियों को 51 हजार रुपये मासिक सम्मान राशि देने के ऐलान पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जो लोग लोकतंत्र की बात कर रहे हैं, उन्हें अपने राजनीतिक फैसलों और अतीत को भी देखना चाहिए। भूपेंद्र सिंह ने आपातकाल का संदर्भ देते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा और कहा कि अखिलेश यादव एक तरफ आपातकाल के दौर की चर्चा करते हैं, जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस के साथ राजनीतिक गठबंधन में हैं।
भूपेंद्र सिंह का यह बयान मूलतः सपा और कांग्रेस के वर्तमान राजनीतिक संबंधों पर राजनीतिक हमला है। आपातकाल 1975 से 1977 के बीच लगा था और उस दौर में विपक्षी नेताओं तथा अन्य लोगों की गिरफ्तारियां हुई थीं। मंत्री ने इसी ऐतिहासिक संदर्भ को अखिलेश यादव के मौजूदा राजनीतिक रुख से जोड़ते हुए सवाल खड़े किए।
एक्सप्रेसवे को लेकर सपा सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप
एक्सप्रेसवे के मुद्दे पर चौधरी भूपेंद्र सिंह ने अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते सपा सरकार के कार्यकाल को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय एक्सप्रेसवे निर्माण में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं और परियोजना का इस्तेमाल निजी एवं पारिवारिक हितों के लिए किया गया। उन्होंने दावा किया कि एक्सप्रेसवे का रूट भी कथित तौर पर जमीन और आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर बदला गया था।
भूपेंद्र सिंह ने सपा सरकार के कार्यकाल में बने एक्सप्रेसवे को लेकर ‘तिजोरी भरने’ और ‘लूट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। ये आरोप मंत्री के राजनीतिक बयान का हिस्सा हैं। उन्होंने इसके विपरीत मौजूदा सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे नेटवर्क के विस्तार का दावा किया और इसे प्रदेश के बुनियादी ढांचे में बदलाव से जोड़कर पेश किया।
पत्रकार सुरक्षा के मुद्दे पर शाहजहांपुर के जगेंद्र सिंह मामले का जिक्र
पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर अखिलेश यादव के बयान पर भी भूपेंद्र सिंह ने पलटवार किया। उन्होंने शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह की 2015 में हुई मौत का उल्लेख करते हुए सपा सरकार के समय पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल उठाए। मंत्री ने आरोप लगाया कि एक मंत्री के खिलाफ खबरें प्रकाशित करने के कारण पत्रकार को निशाना बनाया गया।
हालांकि, इस मामले की परिस्थितियों को निर्विवाद रूप से ‘पत्रकार को जिंदा जलाया गया’ कहना उचित नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार जगेंद्र सिंह आग से गंभीर रूप से झुलसे थे और बाद में उनकी मौत हुई थी। मामले में हत्या के आरोप लगाए गए थे और जांच को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए थे। इसलिए भूपेंद्र सिंह द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्दों को उनके राजनीतिक आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
भूपेंद्र सिंह ने इसके साथ अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस के व्यवहार पर भी आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि सवाल पसंद नहीं आने पर पत्रकारों से उनकी जाति पूछी जाती है और सपा कार्यकर्ताओं पर पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप रहे हैं।
ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश की राजनीतिक नीतियों पर उठाए सवाल
कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव के राजनीतिक रुख को लेकर कई सवाल उठाए। उन्होंने 2017 में सपा-कांग्रेस गठबंधन का जिक्र करते हुए कहा कि गठबंधन के बाद अखिलेश यादव ने खुद उस राजनीतिक फैसले को गलत बताया था। राजभर ने बाद के चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ अखिलेश यादव के बयानों का भी हवाला दिया और कहा कि बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण सपा के रुख पर सवाल उठते हैं।
राजभर ने उत्तराखंड के एक उपचुनाव का उदाहरण देते हुए सपा के वोटों का जिक्र किया और दावा किया कि सपा के वोटों के कारण कांग्रेस को नुकसान हुआ। यह आंकड़ा और उसके आधार पर निकाला गया राजनीतिक निष्कर्ष राजभर के बयान का हिस्सा है, जिसे स्वतंत्र चुनावी विश्लेषण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
इमरजेंसी के इतिहास का हवाला देकर कांग्रेस पर निशाना
ओम प्रकाश राजभर ने आपातकाल का उल्लेख करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने 1975 में आपातकाल लगाए जाने और उस दौरान विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं तथा पत्रकारों की गिरफ्तारियों का जिक्र किया। राजभर ने इसी ऐतिहासिक संदर्भ के आधार पर सवाल किया कि कांग्रेस के साथ राजनीतिक रूप से खड़े होकर अखिलेश यादव लोकतंत्र सेनानियों के सम्मान की बात कैसे कर रहे हैं।
राजभर का तर्क यह था कि लोकतंत्र और आपातकाल का मुद्दा उठाने से पहले राजनीतिक दलों को अपने मौजूदा गठबंधनों और अतीत के राजनीतिक फैसलों का भी जवाब देना चाहिए। यह उनके द्वारा अखिलेश यादव पर किया गया राजनीतिक हमला है।
PDA को लेकर राजभर का अलग अर्थ, परिवार-दौलतमंद-अपराधी का लगाया आरोप
अखिलेश यादव की राजनीति में इस्तेमाल होने वाले PDA—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण पर भी ओम प्रकाश राजभर ने हमला बोला। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में PDA का अलग अर्थ बताते हुए इसे ‘परिवार, दौलतमंद और अपराधी’ कहा।
राजभर ने आरोप लगाया कि सपा में लंबे समय से काम करने वाले कार्यकर्ताओं की तुलना में परिवार और प्रभावशाली लोगों को अधिक महत्व दिया जाता है। उन्होंने सपा की सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति पर सवाल उठाते हुए मुस्लिम, पिछड़े, दलित और सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी उठाया।
राजभर ने आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय के वोट से सपा के उम्मीदवार चुनाव जीतते हैं, लेकिन राज्यसभा जैसे महत्वपूर्ण पदों पर प्रतिनिधित्व देने के समय मुस्लिम नेताओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। उन्होंने PDA में सामान्य वर्ग और पंडित समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर भी सवाल उठाया। ये सभी दावे राजभर के राजनीतिक बयान का हिस्सा हैं।
डिंपल यादव के निर्विरोध निर्वाचन पर राजभर का आरोप
ओम प्रकाश राजभर ने डिंपल यादव के 2012 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव में निर्विरोध चुने जाने का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय विरोधी उम्मीदवारों पर दबाव बनाया गया और उन्हें पर्चे वापस लेने के लिए मजबूर किया गया।
हालांकि उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड यह पुष्टि करता है कि 2012 के कन्नौज उपचुनाव में दो उम्मीदवारों ने अपने नामांकन वापस लिए थे, जिसके बाद डिंपल यादव निर्विरोध निर्वाचित हुईं। उस समय भाजपा, कांग्रेस और बसपा ने उम्मीदवार नहीं उतारे थे।
बाद में इस निर्विरोध निर्वाचन को लेकर अदालत में याचिका भी दाखिल हुई थी, जिसमें सरकार की ओर से दबाव बनाने और नामांकन को प्रभावित करने जैसे आरोप लगाए गए थे। लेकिन उपलब्ध स्रोतों से राजभर द्वारा लगाए गए ‘उम्मीदवारों को अगवा कर जबरन पर्चे वापस कराने’ के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। इसलिए इसे राजभर के आरोप के रूप में ही रिपोर्ट करना उचित है।
चुनावी मुद्दों पर बढ़ी सपा और सत्ता पक्ष के बीच बयानबाजी
अखिलेश यादव के 51 हजार रुपये की सम्मान राशि और मुफ्त इलाज के वादे के बाद सत्ता पक्ष के नेताओं का पलटवार ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। अखिलेश यादव के बयान के जवाब में भूपेंद्र सिंह और ओम प्रकाश राजभर ने लोकतंत्र, कांग्रेस के साथ राजनीतिक संबंध, एक्सप्रेसवे, पत्रकार सुरक्षा और सपा के सामाजिक समीकरण जैसे अलग-अलग मुद्दों को उठाया।
इस पूरे विवाद में अखिलेश यादव और सत्ता पक्ष के नेताओं के दावे राजनीतिक बयानों के रूप में सामने आए हैं। एक्सप्रेसवे में भ्रष्टाचार, पत्रकार मामले में जिम्मेदारी और कन्नौज उपचुनाव में दबाव जैसे आरोपों को तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए संबंधित जांच, न्यायिक रिकॉर्ड या आधिकारिक दस्तावेजों का अलग से संदर्भ जरूरी होगा।



