यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में 75 जिलों की 75 महिला उद्यमियों का ग्रामीण बाजार, एक छत के नीचे दिखा प्रदेश का हुनर
यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में 75 जिलों से स्वयं सहायता समूहों की महिला उद्यमी अपने उत्पाद लेकर पहुंची हैं। अमरोहा के मसाले, अयोध्या की हर्बल चाय, कन्नौज का इत्र, आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी और बनारस के कालीन समेत कई स्थानीय उत्पाद आकर्षण का केंद्र हैं।

यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में 75 जिलों की 75 महिला उद्यमियों का ग्रामीण बाजार, एक छत के नीचे दिखा पूरे प्रदेश का हुनर
लखनऊ, 27 सितंबर। आगरा की जरी-जरदोजी, अमरोहा के मसाले, अयोध्या की हर्बल चाय, आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी, कन्नौज का इत्र, गोरखपुर की टेराकोटा ज्वेलरी और वाराणसी के कालीन—उत्तर प्रदेश के गांवों और कस्बों में महिलाओं के हाथों तैयार हो रहे ये उत्पाद अब स्थानीय हाट-बाजारों तक सीमित नहीं हैं। ग्रेटर नोएडा में आयोजित यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में प्रदेश के 75 जिलों से स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिला उद्यमियों ने अपने उत्पादों के साथ दस्तक दी है। यहां प्रदेश की अलग-अलग भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े उत्पाद एक ही छत के नीचे नजर आ रहे हैं और इनके जरिए ग्रामीण महिलाओं के हुनर तथा उद्यमिता को बड़े बाजार के सामने रखने का अवसर मिला है।
यहां आने वाला हर उत्पाद अपने साथ किसी क्षेत्र की परंपरा और उसे रोजगार में बदलने वाली महिला की कहानी भी लेकर आया है। आगरा की रहनुमा जरी-जरदोजी के उत्पादों के साथ पहुंची हैं तो अमरोहा की कौशल्या गौतम के पिसे मसाले अपनी महक से लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। अयोध्या की रेणु सिंह हर्बल चाय और लेमन ग्रास के उत्पाद लेकर आई हैं, जबकि आजमगढ़ की रीता प्रजापति ब्लैक पॉटरी को बड़े बाजार के सामने प्रस्तुत कर रही हैं। कन्नौज की तारावती के स्टॉल पर इत्र है और वाराणसी की सीता देवी कालीन, फुटमैट और रनर के जरिए बनारस के पारंपरिक हुनर को प्रदर्शित कर रही हैं।

हर जिले के साथ दिख रहा अलग हुनर
यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की भागीदारी केवल उत्पादों की प्रदर्शनी तक सीमित नहीं है। महिला उद्यमियों को अपने उत्पाद सीधे ग्राहकों के सामने रखने, उनकी पसंद समझने, उत्पादों की पैकेजिंग और प्रस्तुति को देखने तथा बड़े बाजार में अपने उत्पाद की संभावनाओं को समझने का अवसर मिल रहा है। प्रदेश के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचते ही उत्पादों की विविधता भी दिखाई देती है। कहीं परंपरागत शिल्प अपनी पहचान के साथ मौजूद है तो कहीं महिलाओं ने रोजमर्रा की जरूरत के सामान को उद्यम का आधार बनाया है।
गोरखपुर की सरोज पाल टेराकोटा ज्वेलरी लेकर आई हैं, जबकि सहारनपुर की सुधा सैनी लकड़ी के हस्तशिल्प और खिलौनों के साथ ट्रेड शो में पहुंची हैं। प्रयागराज की तब्बसुम मकसूद मूंज से टोकरी, डलिया और सजावटी सामान तैयार कर रही हैं। प्रतापगढ़ की प्रज्ञा जायसवाल आंवला-मुरब्बा और आम का अचार लेकर आई हैं, जबकि महोबा की रानी के स्टॉल पर पीतल की मूर्तियां और अन्य शिल्प उत्पाद मौजूद हैं। सिद्धार्थनगर की सरोज देवी ने केले के रेशे को उद्यम का आधार बनाकर बनाना फाइबर उत्पाद तैयार किए हैं। सोनभद्र की मधुबाला हर्बल साबुन, शहद, फिनाइल और जूट बैग के साथ पहुंची हैं, वहीं खीरी की शफीका जूते, चप्पल और बेल्ट जैसे उत्पाद लेकर आई हैं।
चित्रकूट की प्रिया सिंह के लकड़ी के खिलौने, बुलंदशहर की शाहजहां की खुर्जा पॉटरी, कन्नौज की तारावती का इत्र, मथुरा की रेखा के टेराकोटा और मिट्टी के उत्पाद तथा ललितपुर की लीला देवी के गोमय उत्पाद इस ग्रामीण उद्यमिता की विविध तस्वीर को और व्यापक बनाते हैं।
जूट से जरी, मूंज से बनाना फाइबर तक
राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के मिशन निदेशक अरुण कुमार के मुताबिक ट्रेड शो में महिला समूहों की उद्यमशीलता का दायरा केवल पारंपरिक हस्तशिल्प तक सीमित नहीं है। यहां जूट बैग और जरी साड़ी से लेकर चिकनकारी, हैंडलूम, कालीन, लकड़ी के खिलौने, कृत्रिम आभूषण, शहद, मसाले, अचार-मुरब्बा, हर्बल उत्पाद और घरेलू उपयोग के सामान तक प्रदर्शित किए जा रहे हैं। अलग-अलग जिलों से आई महिला उद्यमियों के उत्पादों में स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक कौशल और बदलती उपभोक्ता जरूरतों का मेल दिखाई देता है।
चंदौली की अंजू जरी-जरदोजी सिल्क, बनारसी साड़ी, सूट और दुपट्टे लेकर आई हैं। बाराबंकी की शशि माला चिकनकारी और कृत्रिम आभूषण, रायबरेली की रूबी बानो हैंड ब्लॉक प्रिंट के सूट, साड़ी और दुपट्टे तथा मऊ की माधुरी देवी सिल्क साड़ी प्रदर्शित कर रही हैं। दूसरी तरफ बलिया की रंजना देवी फिनाइल, टॉयलेट क्लीनर, डिशवॉश और हैंडवॉश लेकर आई हैं। जौनपुर की सुषमा सिंह भी सफाई से जुड़े उत्पादों के साथ मौजूद हैं। मुजफ्फरनगर की दीपिका साबुन, सर्फ और हर्बल तेल लेकर पहुंची हैं, जबकि कौशाम्बी की शिमला देवी कुशवाहा अचार और देसी घी के साथ क्लीनर व हैंडवॉश जैसे उत्पाद प्रदर्शित कर रही हैं। इस विविधता में ग्रामीण परंपरा भी है और बाजार की बदलती जरूरतों के अनुरूप विकसित हो रहा उद्यम भी।

बिक्री के साथ बाजार को समझने का अवसर
स्वयं सहायता समूहों के लिए उत्पाद तैयार करना कारोबार की पहली सीढ़ी है, लेकिन उसके बाद ग्राहक और बाजार तक पहुंच बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी संदर्भ में इंटरनेशनल ट्रेड शो महिला उद्यमियों के लिए अपने उत्पादों को बड़े आयोजन में सीधे ग्राहकों और संभावित खरीदारों के सामने रखने का अवसर उपलब्ध करा रहा है।
राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के मिशन निदेशक अरुण कुमार के मुताबिक स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए उत्पाद तैयार करना पूरी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उन्हें बाजार तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। अलग-अलग जिलों के उत्पादों को एक मंच पर रखने से महिला उद्यमियों की ग्राहकों और खरीदारों तक पहुंच बढ़ती है। साथ ही उन्हें यह समझने का अवसर मिलता है कि बाजार किस तरह के उत्पाद पसंद कर रहा है, पैकेजिंग और प्रस्तुति में किन बदलावों की जरूरत हो सकती है और स्थानीय उत्पादों को बड़े बाजार के अनुरूप किस तरह आगे बढ़ाया जा सकता है।
यही प्रक्रिया गांव में तैयार होने वाले उत्पादों को स्थानीय बाजार से आगे प्रदेश और देश के बड़े बाजारों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है। 75 जिलों से आई महिला उद्यमियों की मौजूदगी इस आयोजन को केवल स्टॉलों की कतार नहीं रहने देती, बल्कि इसके जरिए उत्तर प्रदेश के गांवों में तैयार हो रहा हुनर, स्थानीय शिल्प, खानपान से जुड़े उत्पाद और महिलाओं की उद्यमशीलता एक ही मंच पर दिखाई दे रही है।

यूपी के चारों कोनों का हुनर
पश्चिमी यूपी: बागपत की दरी और हैंडलूम चादर, बुलंदशहर की खुर्जा पॉटरी, सहारनपुर का लकड़ी हस्तशिल्प और मेरठ का नेचुरल फूड।
अवध: अयोध्या की हर्बल चाय और लेमन ग्रास उत्पाद, लखनऊ का हैंडलूम, बाराबंकी की चिकनकारी और कृत्रिम आभूषण।
पूर्वांचल: आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी, गोरखपुर की टेराकोटा ज्वेलरी, वाराणसी का कालीन और मऊ की सिल्क साड़ी।
बुंदेलखंड: चित्रकूट के लकड़ी के खिलौने, महोबा की पीतल की मूर्तियां और झांसी का हस्तनिर्मित सजावटी सामान।



