उत्तर प्रदेश

अखिलेश यादव की बुलंदशहर रैली रद्द, रालोद का दावा- 36 कौम के विरोध का असर; ‘समझ आ गया होगा चौधरी कौन है’

अखिलेश यादव का बुलंदशहर दौरा रद्द होने पर पश्चिमी यूपी की सियासत गरमा गई है। रालोद प्रवक्ता रोहित अग्रवाल ने दावा किया कि 36 कौम के विरोध के चलते सपा को रैली रद्द करनी पड़ी।

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के बीच सियासी जुबानी जंग और तेज होती दिखाई दे रही है। अखिलेश यादव के प्रस्तावित बुलंदशहर दौरे के रद्द होने के बाद राष्ट्रीय लोक दल ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला है। रालोद प्रवक्ता रोहित अग्रवाल ने दावा किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 36 कौम के विरोध के चलते सपा को पहले सहारनपुर और अब बुलंदशहर में अपना कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। हालांकि, यह रालोद का राजनीतिक दावा है, जिसे स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। पश्चिमी यूपी में अखिलेश यादव और रालोद के बीच पहले से चल रही बयानबाजी के बीच इस दावे ने राजनीतिक माहौल और गरमा दिया है।

‘समझ में आ गया होगा कि चौधरी कौन है’

रालोद प्रवक्ता रोहित अग्रवाल ने अखिलेश यादव के प्रस्तावित बुलंदशहर दौरे के रद्द होने को लेकर वीडियो जारी कर सपा अध्यक्ष पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता और 36 कौम के विरोध के कारण समाजवादी पार्टी को अपने कार्यक्रम रद्द करने पड़ रहे हैं। अग्रवाल ने कहा कि अब अखिलेश यादव को समझ में आ गया होगा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ‘चौधरी’ कौन है। रालोद नेता ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव ने उस चौधरी परिवार का अपमान करने की कोशिश की, जिसने उनके परिवार को राजनीति की ‘एबीसीडी’ सिखाने का काम किया। उनके इन बयानों के केंद्र में सपा और रालोद के बीच चल रही राजनीतिक तनातनी और चौधरी परिवार को लेकर पश्चिमी यूपी की राजनीति है।

‘एसी में बैठकर वोट नहीं मिलेंगे, जमीन पर आना पड़ेगा’

रोहित अग्रवाल ने अखिलेश यादव पर हमला बोलते हुए कहा कि केवल एसी कमरों या ऑडिटोरियम में बैठकर राजनीति करने से चुनाव नहीं जीता जा सकता। उन्होंने कहा कि चुनाव के समय नेताओं को जनता के बीच जाना पड़ता है और जमीन पर उतरकर लोगों का सामना करना पड़ता है। रालोद प्रवक्ता ने दावा किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान अपने मान-सम्मान को लेकर जागरूक है और आने वाले चुनाव में इसका जवाब देगा। उन्होंने अखिलेश यादव को निशाने पर लेते हुए कहा कि सपा को अब जमीन पर आकर जनता से वोट मांगने होंगे।

2027 के चुनाव को लेकर रालोद ने किया बड़ा दावा

रालोद प्रवक्ता ने 2027 के विधानसभा चुनाव का जिक्र करते हुए समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने दावा किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा को आने वाले चुनाव में जनता के विरोध का सामना करना पड़ेगा और पार्टी एक-एक सीट के लिए तरस जाएगी। यहां तक कि उन्होंने दावा किया कि पश्चिमी यूपी में सपा का खाता तक नहीं खुलेगा। हालांकि ये सभी बातें रालोद प्रवक्ता के राजनीतिक दावे और चुनावी आकलन हैं, इन्हें वर्तमान चुनावी परिणाम या प्रमाणित तथ्य के तौर पर नहीं माना जा सकता। 2027 के विधानसभा चुनाव में ही स्पष्ट होगा कि पश्चिमी यूपी के मतदाताओं का वास्तविक रुख किस राजनीतिक दल के पक्ष में जाता है।

अखिलेश यादव के ‘चवन्नी से रुपया’ बयान से शुरू हुआ विवाद

सपा और रालोद के बीच मौजूदा विवाद की एक बड़ी वजह अखिलेश यादव का ‘चवन्नी से रुपया’ वाला बयान है। अखिलेश यादव ने 17 अगस्त को लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान गठबंधन के पुराने सहयोगियों पर निशाना साधते हुए कहा था कि गठबंधन में ऐसे लोग भी आए थे जिन्हें उन्होंने ‘चवन्नी से रुपया’ बना दिया, लेकिन वे फिर भी साथ छोड़कर चले गए। इस बयान को रालोद प्रमुख जयंत चौधरी पर तंज के तौर पर देखा गया और इसके बाद दोनों दलों के नेताओं के बीच बयानबाजी तेज हो गई। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाट समाज और चौधरी परिवार की भूमिका को देखते हुए इस बयान ने सियासी विवाद को और हवा दी।

सपा प्रदेश अध्यक्ष के बयान से भी बढ़ी तल्खी

अखिलेश यादव के बयान के बाद समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल की ओर से भी इसी तरह की टिप्पणी सामने आई थी। उन्होंने मुजफ्फरनगर में कहा था कि समाजवादी पार्टी ने ‘चवन्नी को रुपया’ बनाने का काम किया और जिन लोगों को राजनीति की एबीसीडी तक नहीं आती थी, उन्हें राजनीतिक मंच देने और आगे बढ़ाने का काम किया। इसके बाद रालोद नेताओं ने समाजवादी पार्टी पर चौधरी चरण सिंह की विरासत और जाट समाज के सम्मान को लेकर सवाल खड़े किए। इसी बयानबाजी की पृष्ठभूमि में अब बुलंदशहर दौरे के रद्द होने को लेकर भी रालोद ने सपा पर राजनीतिक हमला तेज कर दिया है।

बुलंदशहर कार्यक्रम रद्द होने पर सियासत क्यों गरमाई?

अखिलेश यादव के बुलंदशहर दौरे को लेकर सामने आए घटनाक्रम ने इसलिए भी राजनीतिक महत्व हासिल कर लिया है क्योंकि पश्चिमी यूपी में सपा और रालोद के बीच पहले से ही तीखी बयानबाजी चल रही है। रालोद इसे अपने राजनीतिक प्रभाव और पश्चिमी यूपी की जनता के रुख से जोड़कर देख रहा है, जबकि कार्यक्रम रद्द होने के वास्तविक कारणों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। ऐसे में ‘36 कौम के विरोध का असर’ रालोद का दावा है, न कि कोई आधिकारिक रूप से प्रमाणित कारण। 2027 के चुनाव से पहले पश्चिमी यूपी में सपा और रालोद के बीच यह राजनीतिक टकराव आने वाले दिनों में और तेज होने के संकेत दे रहा है।

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